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मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज भर्ती विवाद में बड़ा फैसला: पटना हाईकोर्ट ने 20 असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति रद्द की, नियम उल्लंघन पर सख्त टिप्पणी

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गया: बिहार के अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज में 20 असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई का आखिरकार पटाक्षेप हो गया, जब पटना हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए नियुक्तियों को अवैध करार दे दिया। चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की पीठ ने स्पष्ट कहा कि बहाली प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अधिनियम और वैधानिक प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन हुआ तथा चयन समिति का गठन नियमों के अनुरूप नहीं था, जिसमें विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया और आवश्यक परामर्श भी नहीं लिया गया। अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी और विधिसम्मत नहीं रही, जिसके कारण 20 शिक्षकों की बहाली स्वतः शून्य हो जाती है। मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार पहली बार मार्च 2018 में पदों के लिए विज्ञापन निकला, फरवरी 2019 में इंटरव्यू आयोजित हुआ, लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने अक्टूबर 2019 में बिना स्पष्ट कारण विज्ञापन रद्द कर नए सिरे से बहाली प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसे लेकर अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले 2024 में जस्टिस अंजनी कुमार शरण की सिंगल बेंच ने चयन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाते हुए बहाली रद्द कर दी थी और अब डिवीजन बेंच ने भी उसी निष्कर्ष को सही माना है। कॉलेज के प्राचार्य डॉ अली हुसैन ने कहा कि प्रबंधन ने नियमों के अनुरूप बहाली करने का प्रयास किया था, लेकिन विश्वविद्यालय ने प्रक्रिया को मान्यता नहीं दी, अब अदालत के आदेश के बाद नए सिरे से पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जिसमें सभी योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिलेगा। गौरतलब है कि पहले से एडहॉक पर कार्यरत शिक्षकों रीना कुमारी और मुजफ्फर आलम ने 2021 में ही नियुक्तियों पर नियम उल्लंघन और चयन समिति के गलत गठन का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी। इस कॉलेज की विभिन्न नियुक्तियों को लेकर पहले से 15 से अधिक मुकदमे हाईकोर्ट में लंबित हैं, जिससे संस्थान की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और चयन प्रक्रियाओं पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। न्यायालय ने अपने पूर्व आदेशों में भी कहा था कि शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियुक्तियों में सख्त नियामक नियंत्रण और पारदर्शिता अनिवार्य है, अन्यथा इससे संस्थान की शैक्षणिक विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इस फैसले को विशेषज्ञ अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रियाओं की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण मान रहे हैं और इसे एक स्पष्ट संदेश के रूप में देख रहे हैं कि संवैधानिक संरक्षण के बावजूद किसी भी संस्थान को नियमों से ऊपर नहीं माना जा सकता।

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